घर में कोई बुज़ुर्ग पहले शांत स्वभाव के थे, लेकिन अब छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ होने लगे हैं। चाय थोड़ी देर से मिली तो गुस्सा, टीवी की आवाज़ बदल दी तो गुस्सा, किसी बात को दोबारा पूछ लिया तो गुस्सा। कई बार परिवार के लोग परेशान होकर कह देते हैं—“उम्र हो गई है, अब इनका स्वभाव ही ऐसा हो गया है।”
लेकिन क्या हर गुस्से को बुढ़ापे का स्वाभाविक हिस्सा मान लेना सही है?
जवाब है—नहीं।
उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति के जीवन, शरीर और परिस्थितियों में कई बदलाव आते हैं। इनके कारण चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। लेकिन अचानक बढ़ा हुआ गुस्सा, व्यक्तित्व में बदलाव, शक करना, भूलना, भ्रमित होना या असामान्य व्यवहार कभी-कभी किसी शारीरिक, मानसिक या न्यूरोलॉजिकल बीमारी का संकेत भी हो सकता है।
इसलिए बुज़ुर्ग के गुस्से को केवल “ज़िद” या “बुढ़ापा” कहकर नज़रअंदाज़ करने के बजाय, उसके पीछे छिपे कारण को समझना जरूरी है।
क्या बुढ़ापे में गुस्सा बढ़ना सामान्य है?
उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति चिड़चिड़ा या गुस्सैल हो जाएगा। बहुत से लोग वृद्धावस्था में भी शांत, संतुलित और सामाजिक बने रहते हैं।
हालाँकि, उम्र बढ़ने के साथ कुछ परिस्थितियाँ व्यक्ति को भावनात्मक रूप से संवेदनशील बना सकती हैं:
-
शरीर की ताकत कम होना
-
दूसरों पर निर्भरता बढ़ना
-
सुनने या देखने में परेशानी
-
पुराना दर्द
-
नींद की कमी
-
जीवनसाथी या मित्रों का निधन
-
अकेलापन
-
आर्थिक असुरक्षा
-
परिवार में अपनी भूमिका कम होने का एहसास
-
निर्णय लेने की स्वतंत्रता कम होना
जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी परिवार चलाया हो, फैसले लिए हों और दूसरों की जिम्मेदारी उठाई हो, उसके लिए अचानक दूसरों पर निर्भर होना आसान नहीं होता।
कई बार गुस्से के पीछे असली भावना गुस्सा नहीं, बल्कि बेबस होने का डर होता है।
गुस्सा कई बार एक संदेश होता है
मान लीजिए एक बुज़ुर्ग पिता हर बार नहाने या कपड़े बदलने के लिए कहने पर नाराज़ हो जाते हैं। परिवार को लगता है कि वे जानबूझकर परेशान कर रहे हैं।
लेकिन हो सकता है:
-
उन्हें जोड़ों में दर्द हो रहा हो
-
बाथरूम में गिरने का डर हो
-
उन्हें समझ नहीं आ रहा हो कि उनसे क्या कहा जा रहा है
-
कपड़े बदलवाते समय उन्हें अपनी निजता कम होती महसूस हो रही हो
-
उन्हें डिमेंशिया के कारण स्थिति पहचानने में परेशानी हो रही हो
ऐसे में उनका विरोध व्यवहार से अधिक उनकी परेशानी का संकेत हो सकता है।
जब कोई बुज़ुर्ग अपनी तकलीफ ठीक से शब्दों में नहीं बता पाता, तो वह गुस्से, चिड़चिड़ेपन, चिल्लाने या सहयोग न करने के रूप में सामने आ सकती है।
किन परिस्थितियों में गुस्सा बीमारी का संकेत हो सकता है?
1. डिमेंशिया या अल्ज़ाइमर रोग
डिमेंशिया केवल भूलने की बीमारी नहीं है। यह सोचने, समझने, निर्णय लेने, भाषा, व्यवहार और रोजमर्रा की गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है।
अल्ज़ाइमर और अन्य प्रकार के डिमेंशिया में व्यक्ति:
-
जल्दी परेशान हो सकता है
-
बिना स्पष्ट कारण गुस्सा कर सकता है
-
परिवार पर शक कर सकता है
-
चीजें छिपाकर भूल सकता है और चोरी का आरोप लगा सकता है
-
परिचित लोगों को पहचानने में भ्रमित हो सकता है
-
एक ही सवाल बार-बार पूछ सकता है
-
रात या शाम में अधिक बेचैन हो सकता है
-
देखभाल करने वालों पर चिल्ला या हाथ उठा सकता है
अल्ज़ाइमर रोग में बीमारी बढ़ने के साथ भ्रम और व्यवहार में बदलाव दिखाई दे सकते हैं। कुछ लोगों में बेचैनी, डर, शक और आक्रामकता भी बढ़ सकती है।
यह याद रखना जरूरी है कि ऐसा व्यक्ति जानबूझकर परिवार को परेशान नहीं कर रहा होता। उसका दिमाग आसपास की परिस्थितियों को पहले की तरह समझ नहीं पा रहा होता।
2. फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया
कुछ प्रकार के डिमेंशिया में शुरुआत भूलने से नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और व्यवहार बदलने से होती है।
व्यक्ति अचानक:
-
असंवेदनशील बातें करने लगे
-
सामाजिक मर्यादा भूलने लगे
-
अत्यधिक गुस्सा करने लगे
-
बिना सोचे फैसले करने लगे
-
दूसरों की भावनाओं की परवाह कम करने लगे
-
पहले से बिल्कुल अलग स्वभाव का हो जाए
व्यवहार संबंधी फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया में व्यक्तित्व, निर्णय और सामाजिक व्यवहार में प्रमुख बदलाव हो सकते हैं, जबकि शुरुआती चरण में याददाश्त अपेक्षाकृत ठीक भी रह सकती है।
3. बुज़ुर्गों में डिप्रेशन
डिप्रेशन हमेशा रोने या उदास दिखने के रूप में सामने नहीं आता। बुज़ुर्गों में यह कई बार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, शरीर की शिकायतें या परिवार से दूरी के रूप में दिखाई देता है।
ध्यान देने योग्य संकेत हैं:
-
किसी काम में मन न लगना
-
पहले पसंद आने वाली चीजों में रुचि कम होना
-
नींद और भूख में बदलाव
-
बार-बार कहना कि “अब मेरा कोई महत्व नहीं”
-
अत्यधिक थकान
-
अकेले रहना
-
निराशा
-
छोटी बातों पर भड़क जाना
-
जीवन को बोझ मानना
कई परिवार इन लक्षणों को “बुढ़ापे की उदासी” समझते हैं, जबकि बुज़ुर्ग को उपचार योग्य डिप्रेशन हो सकता है।
4. डिलीरियम: अचानक भ्रम और व्यवहार बदलना
यदि किसी बुज़ुर्ग का व्यवहार कुछ घंटों या दिनों में अचानक बदल जाए, तो इसे सामान्य बुढ़ापा न मानें।
उदाहरण के लिए:
-
अचानक बहुत गुस्सा या बेचैनी
-
लोगों को पहचानने में कठिनाई
-
समय या स्थान का भ्रम
-
उल्टी-सीधी बातें करना
-
ऐसी चीजें देखना या सुनना जो मौजूद नहीं हैं
-
दिन में अत्यधिक नींद और रात में बेचैनी
-
ध्यान न लगा पाना
यह डिलीरियम हो सकता है, जो कई बार संक्रमण, पेशाब की बीमारी, निमोनिया, दवाओं के दुष्प्रभाव, पानी की कमी, इलेक्ट्रोलाइट गड़बड़ी, स्ट्रोक या दूसरी शारीरिक बीमारी के कारण होता है। अचानक भ्रम की स्थिति का शीघ्र चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी होता है।
यदि बदलाव अचानक हुआ है, तो केवल मनोचिकित्सक की अपॉइंटमेंट का इंतजार न करें। पहले निकटतम अस्पताल या चिकित्सक से तुरंत संपर्क करें।
5. सुनने की समस्या
कई बार बुज़ुर्ग ठीक से सुन नहीं पाते, लेकिन परिवार को इसका अंदाजा नहीं होता।
जब उन्हें बातचीत का आधा हिस्सा सुनाई देता है, तो उन्हें लग सकता है कि:
-
लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं
-
परिवार जानबूझकर उन्हें अनदेखा कर रहा है
-
उनसे बातें छिपाई जा रही हैं
-
उनसे गलत तरीके से बात की जा रही है
परिणामस्वरूप वे बार-बार पूछते हैं, गलत समझते हैं और गुस्सा हो जाते हैं।
इसलिए व्यवहार में बदलाव के साथ सुनने और देखने की जाँच भी महत्वपूर्ण है।
6. पुराना दर्द और शारीरिक बीमारी
घुटनों का दर्द, कमर दर्द, कब्ज, दाँत का दर्द, पेशाब की परेशानी, सांस फूलना या शरीर में लगातार तकलीफ व्यक्ति को चिड़चिड़ा बना सकती है।
बुज़ुर्ग अक्सर दर्द को सीधे नहीं बताते। वे कह सकते हैं:
-
“मुझे अकेला छोड़ दो।”
-
“कोई मेरी बात नहीं समझता।”
-
“सब मुझे परेशान कर रहे हैं।”
हर बार केवल शांत करने की दवा देने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि कहीं व्यक्ति दर्द, कब्ज, संक्रमण या नींद की कमी से तो परेशान नहीं है।
7. दवाओं का दुष्प्रभाव
बुज़ुर्ग अक्सर कई बीमारियों की अलग-अलग दवाएँ लेते हैं। कुछ दवाएँ या दवाओं का गलत संयोजन भ्रम, बेचैनी, नींद, चिड़चिड़ापन या व्यवहार में बदलाव पैदा कर सकता है।
खासकर ध्यान दें यदि:
-
हाल में कोई नई दवा शुरू हुई हो
-
दवा की मात्रा बदली गई हो
-
मरीज ने स्वयं कोई दवा बंद की हो
-
नींद की गोलियाँ या दर्द की दवाएँ नियमित ली जा रही हों
-
अलग-अलग डॉक्टरों की दवाएँ बिना समन्वय के चल रही हों
सभी दवाओं की सूची डॉक्टर को अवश्य दिखाएँ। कोई भी दवा स्वयं से अचानक बंद न करें।
8. नींद की कमी
रात में बार-बार पेशाब आना, सांस की समस्या, खर्राटे, दर्द, बेचैनी या दिन में ज्यादा सोने से रात की नींद बिगड़ सकती है।
नींद की कमी से:
-
धैर्य कम होता है
-
याददाश्त प्रभावित होती है
-
गुस्सा बढ़ता है
-
भ्रम और बेचैनी बढ़ सकती है
-
दिनचर्या बिगड़ जाती है
डिमेंशिया वाले कुछ लोगों में शाम के समय भ्रम और उत्तेजना बढ़ जाती है, जिसे अक्सर “संडाउनिंग” कहा जाता है।
सामान्य उम्र बढ़ना और बीमारी में अंतर कैसे पहचानें?
कभी-कभी नाराज़ होना सामान्य मानवीय व्यवहार है। चिंता तब होती है जब व्यवहार व्यक्ति के पुराने स्वभाव से स्पष्ट रूप से अलग हो और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे।
सामान्य बदलाव
-
कभी-कभी चिड़चिड़ापन
-
किसी तनावपूर्ण स्थिति में गुस्सा
-
बात बाद में समझ आने पर शांत हो जाना
-
रोजमर्रा के काम स्वयं कर पाना
-
तारीख भूलकर बाद में याद आ जाना
-
गुस्से का कोई स्पष्ट कारण होना
बीमारी की आशंका वाले संकेत
-
व्यक्तित्व में लगातार बदलाव
-
रोज छोटी बातों पर अत्यधिक गुस्सा
-
गाली देना या मारने की कोशिश करना
-
परिवार पर चोरी या साजिश का आरोप लगाना
-
बार-बार रास्ता भूलना
-
गैस, दवा या पैसे संभालने में गलती
-
परिचित लोगों को न पहचानना
-
असामान्य शक या भ्रम
-
ऐसी आवाजें सुनना या चीजें देखना जो मौजूद नहीं हैं
-
अचानक भ्रमित हो जाना
-
स्वयं की सफाई और भोजन की उपेक्षा
-
व्यवहार के कारण परिवार या स्वयं की सुरक्षा खतरे में पड़ना
परिवार को क्या नहीं करना चाहिए?
हर बात पर बहस न करें
डिमेंशिया या भ्रम की स्थिति में तर्क देकर जीतना संभव नहीं होता। बहस अक्सर गुस्सा बढ़ा देती है।
यदि बुज़ुर्ग कहें, “तुमने मेरे पैसे चुरा लिए,” तो तुरंत यह कहना कि “आप हमेशा झूठा आरोप लगाते हैं” स्थिति खराब कर सकता है।
बेहतर उत्तर हो सकता है:
“आपके पैसे नहीं मिल रहे हैं, इसलिए आपको चिंता हो रही है। चलिए, हम साथ में ढूँढ़ते हैं।”
उन्हें बच्चा समझकर बात न करें
उम्र या बीमारी के कारण व्यक्ति की क्षमताएँ कम हो सकती हैं, लेकिन उसका सम्मान कम नहीं होना चाहिए।
उनके सामने उनके बारे में ऐसे बात न करें जैसे वे कमरे में मौजूद ही नहीं हैं।
चिल्लाकर जवाब न दें
तेज आवाज़, कई लोगों का एक साथ समझाना या आदेश देने वाला लहजा उन्हें और भयभीत कर सकता है।
धीरे बोलें, एक समय में एक ही बात कहें और जवाब देने के लिए समय दें।
हर गुस्से को जानबूझकर किया गया व्यवहार न मानें
कई बार व्यवहार के पीछे बीमारी, दर्द, डर या भ्रम होता है। कारण खोजे बिना व्यक्ति को “जिद्दी” या “नाटक करने वाला” कहना समस्या को बढ़ा सकता है।
बिना डॉक्टर के नींद या शांत करने की दवा न दें
बुज़ुर्गों में कुछ दवाएँ गिरने, अधिक नींद, भ्रम, स्ट्रोक या दूसरी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती हैं। डिमेंशिया से जुड़े व्यवहार के लिए दवाओं का चयन बहुत सावधानी से किया जाता है; कुछ एंटीसाइकोटिक दवाओं के साथ वृद्ध मरीजों में गंभीर जोखिम हो सकते हैं।
परिवार क्या कर सकता है?
गुस्से का पैटर्न नोट करें
एक डायरी बनाकर लिखें:
-
गुस्सा किस समय होता है?
-
उससे पहले क्या हुआ था?
-
कौन व्यक्ति आसपास था?
-
क्या मरीज भूखा, थका या दर्द में था?
-
क्या शाम को व्यवहार अधिक बिगड़ता है?
-
क्या नई दवा शुरू हुई है?
-
क्या नींद ठीक है?
इससे ट्रिगर पहचानने और डॉक्टर को सही जानकारी देने में मदद मिलेगी।
दिनचर्या नियमित रखें
बुज़ुर्गों को एक अनुमानित दिनचर्या सुरक्षा का अनुभव देती है।
यथासंभव:
-
जागने का समय तय रखें
-
भोजन समय पर दें
-
दवाएँ नियमित दें
-
दिन में हल्की गतिविधि कराएँ
-
शाम के बाद चाय-कॉफी कम रखें
-
कमरे में पर्याप्त रोशनी रखें
-
परिचित लोगों और वस्तुओं को आसपास रखें
एक समय में एक निर्देश दें
“उठिए, कपड़े बदलिए, दवा खाइए और नीचे चलिए” कहने के बजाय एक-एक बात कहें।
पहले कहें, “चलिए, धीरे से बैठते हैं।”
फिर अगला कदम बताएं।
विकल्प दें, आदेश नहीं
“अभी नहाना ही पड़ेगा” की जगह कहें:
“आप अभी नहाना पसंद करेंगे या नाश्ते के बाद?”
छोटे विकल्प व्यक्ति को नियंत्रण का एहसास देते हैं।
ध्यान दूसरी ओर मोड़ें
यदि बहस बढ़ रही हो, तो विषय बदलें, पुराना संगीत चलाएँ, तस्वीरें दिखाएँ या थोड़ी देर बाहर टहलाएँ।
हर बात का समाधान उसी क्षण करना जरूरी नहीं है।
चश्मा और हियरिंग एड सही रखें
देखने-सुनने की कमी भ्रम और गलतफहमी बढ़ा सकती है। सुनिश्चित करें कि चश्मा साफ हो और हियरिंग एड काम कर रहा हो।
देखभाल करने वाले का ध्यान भी रखें
लगातार गुस्से, आरोप और रात की बेचैनी को संभालना परिवार के लिए मानसिक रूप से थकाने वाला हो सकता है।
देखभाल करने वाले को:
-
आराम लेना चाहिए
-
जिम्मेदारी बाँटनी चाहिए
-
अपराधबोध से बचना चाहिए
-
जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लेनी चाहिए
-
गंभीर आक्रामकता में अकेले स्थिति संभालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए
अच्छी देखभाल का अर्थ यह नहीं कि एक व्यक्ति अपनी पूरी शारीरिक और मानसिक क्षमता समाप्त कर दे।
डॉक्टर किस प्रकार जाँच करते हैं?
डॉक्टर केवल यह नहीं पूछते कि मरीज गुस्सा करता है या नहीं। वे यह समझने की कोशिश करते हैं कि व्यवहार कब शुरू हुआ, कैसे बदला और उसके साथ कौन से अन्य लक्षण हैं।
मूल्यांकन में शामिल हो सकते हैं:
-
मरीज और परिवार से विस्तृत बातचीत
-
याददाश्त और सोचने की क्षमता की जाँच
-
डिप्रेशन और चिंता का मूल्यांकन
-
पूरी शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल जाँच
-
दवाओं की समीक्षा
-
सुनने और देखने की जाँच
-
खून की जाँच
-
थायरॉइड, विटामिन या इलेक्ट्रोलाइट संबंधी जाँच
-
जरूरत पड़ने पर ब्रेन स्कैन
डिमेंशिया या हल्की संज्ञानात्मक कमजोरी का निदान किसी एक परीक्षण से नहीं होता। मरीज का इतिहास, दैनिक कार्यक्षमता, चिकित्सा परीक्षण और संज्ञानात्मक मूल्यांकन मिलाकर निष्कर्ष निकाला जाता है।
उपचार कैसे होता है?
उपचार पूरी तरह कारण पर निर्भर करता है।
यदि दर्द या संक्रमण है
दर्द, कब्ज, पेशाब का संक्रमण, पानी की कमी या दूसरी बीमारी का उपचार करने से व्यवहार में काफी सुधार हो सकता है।
यदि डिप्रेशन है
काउंसलिंग, सामाजिक जुड़ाव, दिनचर्या और आवश्यकता के अनुसार दवा उपयोगी हो सकती है।
यदि डिमेंशिया है
उपचार का उद्देश्य हो सकता है:
-
बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करना
-
मरीज की सुरक्षा बढ़ाना
-
भ्रम और बेचैनी के ट्रिगर कम करना
-
परिवार को व्यवहार संभालने की तकनीक सिखाना
-
नींद और दिनचर्या सुधारना
-
जरूरत के अनुसार दवाओं का सावधानीपूर्वक उपयोग करना
डिमेंशिया का व्यवहार केवल दवा से नहीं संभलता। वातावरण, संवाद, दर्द नियंत्रण, दिनचर्या और देखभाल का तरीका अक्सर उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
कब तुरंत अस्पताल जाना चाहिए?
तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें यदि बुज़ुर्ग:
-
अचानक भ्रमित हो जाएँ
-
बोलने में अचानक कठिनाई हो
-
चेहरे या शरीर के एक हिस्से में कमजोरी हो
-
बेहोश हों या दौरा पड़े
-
तेज बुखार के साथ व्यवहार बदल जाए
-
गिरने के बाद भ्रमित हों
-
परिवार या स्वयं को चोट पहुँचाने की कोशिश करें
-
खाना-पानी पूरी तरह छोड़ दें
-
ऐसी चीजें देखने या सुनने लगें जो मौजूद नहीं हैं
-
आत्महत्या या मरने की बात करें
अचानक भ्रम कई बार आपातकालीन शारीरिक बीमारी का संकेत हो सकता है और इसका शीघ्र मूल्यांकन आवश्यक है।
एक बात परिवार को हमेशा याद रखनी चाहिए
बुज़ुर्ग का गुस्सा परिवार के लिए कठिन हो सकता है। बार-बार आरोप सुनना, रात में जागना या हर बात पर विरोध सहना आसान नहीं है।
लेकिन गुस्से के पीछे छिपा संदेश समझने की कोशिश करें।
वह संदेश हो सकता है:
“मुझे दर्द हो रहा है।”
“मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है।”
“मुझे डर लग रहा है।”
“मुझे लगता है कि अब मेरी कोई नहीं सुनता।”
“मैं अपनी स्वतंत्रता खो रहा हूँ।”
या फिर:
“मेरा दिमाग अब पहले की तरह काम नहीं कर रहा।”
हर व्यवहार को सही ठहराना जरूरी नहीं है, लेकिन उसके कारण को समझना उपचार की पहली सीढ़ी है।
निष्कर्ष
बुज़ुर्गों का कभी-कभी नाराज़ होना सामान्य हो सकता है, लेकिन लगातार बढ़ता गुस्सा, अचानक व्यक्तित्व परिवर्तन, शक, भूलना, भ्रम, नींद का बिगड़ना या आक्रामकता केवल बुढ़ापे का हिस्सा मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
इसके पीछे डिप्रेशन, डिमेंशिया, डिलीरियम, दर्द, संक्रमण, सुनने की समस्या, नींद की कमी या दवाओं का दुष्प्रभाव हो सकता है।
समय पर जाँच कराने से कई उपचार योग्य कारणों की पहचान हो सकती है। सही उपचार और परिवार के संवेदनशील व्यवहार से बुज़ुर्ग तथा उनकी देखभाल करने वाले—दोनों का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या हर गुस्सैल बुज़ुर्ग को डिमेंशिया होता है?
नहीं। गुस्से के कई कारण हो सकते हैं, जैसे दर्द, अकेलापन, डिप्रेशन, नींद की कमी, सुनने की समस्या या पारिवारिक तनाव। डिमेंशिया की आशंका तब अधिक होती है जब गुस्से के साथ याददाश्त, निर्णय, व्यवहार या दैनिक काम करने की क्षमता में गिरावट दिखाई दे।
बुज़ुर्ग अचानक बहुत गुस्सा करने लगें तो क्या करें?
पहले देखें कि बदलाव अचानक हुआ है या धीरे-धीरे। अचानक बदलाव के साथ भ्रम, बुखार, कमजोरी या असामान्य नींद हो तो तुरंत डॉक्टर या अस्पताल से संपर्क करें।
क्या गुस्से की दवा उपलब्ध है?
गुस्सा स्वयं एक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षण है। दवा तभी दी जाती है जब कारण स्पष्ट हो और लाभ संभावित जोखिम से अधिक हो। बिना चिकित्सकीय सलाह के शांत करने या नींद की दवा देना नुकसानदायक हो सकता है।
क्या डिमेंशिया वाले व्यक्ति से उसकी गलती समझानी चाहिए?
शांत तरीके से समझाना ठीक है, लेकिन बार-बार बहस करना या उसे गलत सिद्ध करने की कोशिश करना अक्सर बेचैनी बढ़ाता है। भावना को स्वीकार करके ध्यान दूसरी ओर मोड़ना अधिक उपयोगी हो सकता है।
किस डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
आप शुरुआत किसी फिजिशियन, जेरियाट्रिक विशेषज्ञ, न्यूरोलॉजिस्ट या मनोचिकित्सक से कर सकते हैं। व्यवहार, याददाश्त और मानसिक लक्षण प्रमुख हों तो मनोचिकित्सक का मूल्यांकन विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
चिकित्सकीय अस्वीकरण: यह लेख केवल जागरूकता और शिक्षा के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके आधार पर स्वयं निदान या दवा शुरू अथवा बंद न करें। व्यवहार में अचानक बदलाव, भ्रम, हिंसक व्यवहार या आत्महत्या के विचार होने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लें।